इस जहाँ में आया तो न जाने
क्या सोच रहा था,
हर अजनबी सी चीज़ में
जाने क्या खोज रहा था,
कुछ देखकर रोना आ जाये
कुछ देख कर हँसना आ जाये
कौन क्या कह रहा था पता नहीं
मैं क्या बोल रहा था पता नहीं
चलती चीज़ें पकडने को मन था बेकरार
आखों में थे बुने हुए सपने कई हज़ार
भूख लगे तो कह ना पाता
कुछ ना मिले तो रोने लग जाता
डर लगे तो भाग न पाता
कैसे बचूँ कुछ समझ ना पता
एक ही शैय्या पर नींद थी आती
माँ जब गोदी लेकर झुलाती
मुँह मेरे दाँत नहीं थे
फिर भी चबाने की कोशिश करता
ज्ञान नहीं था मेरे अन्दर
फिर भी समझने की कोशिश करता
बडे - बडे से चेहरे मुझसे
करते रहते कुछ-कुछ बातें
मैं खल मूरख ठगा हुआ सा
कभी हाथ चलाऊँ कभी लातें
पडे - पडे छोटी शैय्या पर
मैं ना जाने क्या सोच रहा था
हर अजनबी सी चीज़ में
मैं जाने क्या खोज रहा था
अपनी बात समझानी हो तो
लाखों जतन मैं करता था
ताली बजा - बजा कर मैम तो
अपने में मगन रहता था
पोपल मुख पर हँसी को लाकर
बडे - बडों को खुश करता था
कोइ कुछ भी कर ले पर मैं
बिस्तर खराब बडे शान से करता था
पडे - पडे झूले में मैं
जाने क्या सोचा करता था
हर अजनबी सी चीज़ में
मैं जाने क्या सोचा करता था
द्वारा:
संजीव भदौरिया स्नातकोत्तर अध्यापक
संगणक-विज्ञान |